सोलर इंडस्ट्री को अब तक आम आदमी के लिए सस्ती और भविष्य की ऊर्जा माना जा रहा था, लेकिन 2026 की तरफ बढ़ते हुए तस्वीर तेजी से बदल रही है। जिस सोलर सिस्टम को लोग बिजली बिल से छुटकारा पाने का आसान रास्ता समझ रहे थे, वही अब “लग्ज़री प्रोडक्ट” बनने की कगार पर खड़ा दिख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है चीन द्वारा भारत के खिलाफ वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन यानी WTO में दायर किया गया केस। यह मामला सिर्फ सरकारों के बीच का ट्रेड विवाद नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आम भारतीय ग्राहक की जेब पर पड़ने वाला है। अगर आप Solar System लगवाने की सोच रहे हैं या पहले से जुड़े हुए हैं तो यह समझना बेहद जरूरी है कि आने वाले समय में क्या होने वाला है और क्यों 2026 में सोलर पैनल महंगे हो सकते हैं।

चीन ने WTO में भारत के खिलाफ क्या आरोप लगाए?
चीन का आरोप है कि भारत सोलर सेक्टर में WTO के नियमों का उल्लंघन कर रहा है। सबसे पहला और अहम आरोप “नेशनल ट्रीटमेंट” के उल्लंघन का है। इसका मतलब यह है कि कोई भी विदेशी प्रोडक्ट जब भारत की सीमा में प्रवेश कर ले, तो उसके साथ घरेलू प्रोडक्ट जैसा ही व्यवहार होना चाहिए। चीन का कहना है कि भारत अपनी घरेलू सोलर कंपनियों को PLI स्कीम, सब्सिडी और अन्य इंसेंटिव दे रहा है, जिससे भारतीय पैनल सस्ते पड़ते हैं, जबकि चीन से आने वाले पैनल महंगे हो जाते हैं। यह WTO के नियमों के खिलाफ है क्योंकि इसमें आयातित माल के साथ भेदभाव हो रहा है।
दूसरा बड़ा आरोप DCR यानी डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट को लेकर है। भारत की कई सरकारी योजनाओं, खासकर पीएम सूर्य घर योजना में यह अनिवार्य कर दिया गया है कि केवल भारतीय DCR सोलर पैनल ही लगाए जाएंगे। चीन का तर्क है कि किसी भी निवेशक या डेवलपर को यह मजबूर नहीं किया जा सकता कि वह सिर्फ लोकल प्रोडक्ट ही इस्तेमाल करे। उसे यह आज़ादी होनी चाहिए कि वह जहां से सस्ता और बेहतर माल मिले, वहां से खरीदे। तीसरा और सबसे गंभीर आरोप “प्रोहिबिटेड सब्सिडी” का है। चीन का कहना है कि भारत की PLI स्कीम असल में इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन सब्सिडी है, जो WTO के नियमों में पूरी तरह प्रतिबंधित है।
भारत की रणनीति और आत्मनिर्भरता की हकीकत
भारत सरकार ने सोलर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए PLI स्कीम लॉन्च की और करीब 19,500 करोड़ रुपये का फंड भी अलॉट किया। इसका मकसद साफ था कि भारत सोलर सेक्टर में आत्मनिर्भर बने और चीन पर निर्भरता कम हो। बड़े-बड़े कॉर्पोरेट हाउस को भारत में फैक्ट्रियां लगाने के लिए आमंत्रित किया गया और आज कई कंपनियां देश में सोलर पैनल बना भी रही हैं। कागजों पर यह तस्वीर काफी मजबूत दिखती है, लेकिन असली चुनौती कच्चे माल को लेकर है।
सोलर पैनल हवा से नहीं बनते, बल्कि इसके लिए पॉलीसिलिकॉन, वेफर्स और सेल जैसे रॉ मटेरियल की जरूरत होती है। सच्चाई यह है कि पॉलीसिलिकॉन का करीब 91%, वेफर्स का 97% और सोलर सेल का लगभग 80% कंट्रोल चीन के पास है। भारत में आज भी पॉलीसिलिकॉन प्रोडक्शन लगभग शून्य के बराबर है। यानी हम चीन से वेफर्स और सेल खरीदते हैं, भारत में उन्हें असेंबल करते हैं और फिर उसे “मेड इन इंडिया” कह देते हैं। जब तक रॉ मटेरियल पर हमारा कंट्रोल नहीं होगा, तब तक आत्मनिर्भरता अधूरी ही रहेगी।
कीमतों का खेल और आम ग्राहक की परेशानी
अब सवाल यह उठता है कि इसका असर ग्राहक पर कैसे पड़ रहा है। आज की तारीख में इंटरनेशनल मार्केट में हाई-एंड टेक्नोलॉजी जैसे TOPCon या HJT सोलर पैनल नॉन-DCR कैटेगरी में लगभग ₹14 से ₹16 प्रति वॉट तक मिल जाते हैं। इनमें बेहतर एफिशिएंसी, लंबी वारंटी और नई टेक्नोलॉजी शामिल होती है। वहीं भारतीय DCR पैनल की कीमत ₹24 से ₹28 प्रति वॉट तक पहुंच रही है। यानी देशभक्ति के नाम पर ग्राहक को लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ रही है।
यह सवाल भी जायज़ है कि जब कच्चा माल सस्ता नहीं है, लेबर इंडिया में सस्ती है और सरकार इंसेंटिव भी दे रही है तो फिर पैनल इतने महंगे क्यों हैं। असल में PLI और सब्सिडी का फायदा किसे मिल रहा है, यह बड़ा सवाल बन चुका है। ग्राहक को सस्ती बिजली का सपना दिखाया जा रहा है, लेकिन हकीकत में वही ग्राहक ज्यादा कीमत चुका रहा है। ऊपर से टेक्नोलॉजी के नाम पर आज भी कई जगह पुराने P-Type पैनल बेचे जा रहे हैं, जबकि दुनिया 30% एफिशिएंसी वाली नई टेक्नोलॉजी की तरफ बढ़ रही है।
2026 में सोलर पैनल खरीदें या इंतजार करें?
अब सबसे अहम सवाल यही है कि आम भारतीय क्या करे। चीन द्वारा WTO में केस डालने के बाद सिर्फ कानूनी लड़ाई ही नहीं शुरू हुई, बल्कि चीन ने रॉ मटेरियल की कीमतें भी बढ़ानी शुरू कर दी हैं। इसका मतलब साफ है कि आने वाले समय में सोलर पैनल की लागत और बढ़ सकती है। WTO में यह केस लंबा चल सकता है और उसका फैसला चाहे जो भी हो, लेकिन शॉर्ट टर्म में कीमतों पर दबाव बढ़ने की पूरी संभावना है।
अगर आप सोलर सिस्टम लगवाने की योजना बना रहे हैं, तो मौजूदा समय को सही मौका माना जा सकता है। आने वाले महीनों या 2026 में यही सिस्टम 10 से 15 प्रतिशत तक महंगा हो सकता है। लंबे समय के समाधान के लिए भारत को पॉलीसिलिकॉन से लेकर पूरी वैल्यू चेन पर काम करना होगा। जब तक रेत से पैनल बनाने तक की ताकत भारत के पास नहीं आएगी, तब तक सोलर सच में सस्ता और सुलभ नहीं बनेगा। फिलहाल सच यही है कि यह ट्रेड वॉर सीधे तौर पर आम ग्राहक की जेब पर असर डाल रहा है और अगर समय रहते सही फैसले नहीं लिए गए तो 2026 में सोलर पैनल सचमुच “लग्ज़री” बन सकते हैं।
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